चाची ने मर्द बन चुदाई में मुझे दर्द दे दिया


गर्मी की छुट्टियों में चाचू मुझे शहर बुला लिया करते थे। मुझे भी उनके पास बहुत अच्छा लगता था। चाची मुझे बहुत प्यार करती थी। उन्हीं की मेहरबानी से मेरे पास एक मंहगी मोटरसाईकल और एक बढ़िया सेलफोन भी था। इसलिये मुझे यह भी आशा रहती थी कि चाची मुझे कुछ ना कुछ तो दिला ही देगी। मेरा और चाची का प्यार देख कर चाचू भी बहुत खुश थे।

मैं तो अब कॉलेज जाने लगा था। बड़ा हो गया था। चाची की आसक्ति भरी नजरे मैं पहचानने भी लगा था, हांलाकि वो मुझसे पन्द्रह वर्ष बड़ी थी। अक्सर वो मेरे नहाने के समय मुझे तौलिया देने आ जाती थी और मुझसे छेड़खानी भी करती थी। मुझे सच कहूँ तो बड़ा ही आनन्द आता था। वो मेरा लण्ड खड़ा कर जाती थी। फिर मुझे मुठ मारनी ही पड़ती थी। मैंने चाची के नाम की बहुत बार मुठ भी मारी थी। मैं भी उन्हें पूरा मौका देता था कि वो मेरे अंगों को छू लें और मेरे साथ मस्ती करें।

इसी मस्ती के दौरान चाची ने एक बार मेरे कसे हुये चूतड़ों को सहला भी दिया था और बोली थी- तेरे चूतड़ तो बहुत कसे हुये और सख्त हैं !

तब मैंने जल्दी से चाची के चूतड़ दबा दिये कहा- हाय चाची, आपके तो बहुत नरम हैं !

धत्त, बड़ा शरारती है रे तू तो ! और वो छिटक कर दूर हो गई।

इसी तरह उन्होंने एक बार नहाते हुये मेरा सख्त लण्ड पकड़ लिया और बोली- मनीष, अब तो तेरे लिए दुल्हनिया लानी ही पड़ेगी, वरना यह तो कुंवारा ही रह जायेगा।

मैंने मौका देखा और बिना किसी हिचक चाची की भारी चूचियाँ पकड़ ली और दबाने लगा- चाची, आप जो हो ना, प्लीज मेरा कंवारापन तोड़ दो !

वो मेरा हाथ अपनी चूचियों से हटाने लगी। पर मैंने उन्हें और दबा दिया और उन्हें अपनी बाहों में कस लिया।

ओह छोड़ ना, तू मुझे बिल्कुल मत छूना, वर्ना पिट जायेगा !

उनकी धमकी से मैं डर गया और उनसे छिटक गया। वो हंसती हुई चली गई। मैं असमंजस में उन्हें देखता रह गया।

रात के नौ बज रहे थे। मैं रोज की तरह टीवी देख रहा था। चाची भी मेरे समीप आकर बैठ गई। हम बातें भी करते जा रहे थे और टीवी भी देखते जा रहे थे। अचानक चाची के कोमल हाथ मेरी जांघ पर आ गये। मैं सिहर सा गया। मुझे पता था कि चाची अब क्या करने वाली थी। मैं उठ कर जाने लगा।

अरे बैठ तो जाओ मनीष, मैं कौन तुम्हें खाने जा रही हूँ।

मैं बैठ गया। मेरी जांघ के आस पास हाथ फ़ेरते हुये वो मुझे गुदगुदी सी करने लगी। उनका हाथ अब तक दो बार मेरे लण्ड को भी छू चुका था। बेचारा लण्ड, स्त्री स्पर्श पाकर वो अपना सर उठाने लगा था। मेरे मन में भी एक बार तो तरंग सी उठने लगी।

चाची को तो बस इसी का जैसे इन्तज़ार था। मेरे पायजामे का उठान देख कर वो खुश हो उठी थी। उसने अपना कोमल सा हाथ अब मेरे लण्ड के ऊपर रख दिया था।

मैं हटाता कैसे भला, मस्ती सी जो चढ़ने लगी थी। अब मेरा ध्यान टीवी की तरफ़ बिल्कुल नहीं था। बस मैं इन्तज़ार करने लगा था कि चाची अब क्या करती है। उन्होंने मेरा लण्ड अब धीरे से दबा दिया। उत्तेजना के मारे लण्ड कड़क हो कर सीधा तन गया। चाची को आराम हो गया… वो अब आराम से मेरे पूरे डण्डे को हाथ से सहलाने लगी थी। लण्ड लम्बा भी था सो स्पष्ट रूप से बहुत ही बाहर की ओर उभर आया था। मैं अपने चूतड़ों को ऊपर उठा कर लण्ड को और भी बाहर उभार रहा था।

तभी भाभी ने मेरे पायजामे का नाड़ा खोल दिया। मैंने चाची की ओर देखा ओर जल्दी से अपना पायजामा थाम लिया। तभी उन्होंने जोर से झटक कर मेरा पायजामा जांघों तक खींच दिया। मेरा लण्ड एकदम से स्वतन्त्र हो गया और बाहर निकल कर झूमने लगा।

“अरे चाची क्या करती हो?” मेरा दिल किलकारी मारने लगा।

“तेरी जवानी का आनन्द ले रही हूँ, चल हाथ हटा अपने लौड़े से !”

उन्होंने मेरा हाथ हटा कर मेरे तने हुये लण्ड को पकड़ लिया। मैंने इसमें उन्हें सहायता की।

“मस्त लम्बा है साला !” कहते हुए उन्होंने मेरे लण्ड को ऊपर से नीचे तक हाथों से मल दिया। मेरे लण्ड से दो खुशी की बून्दें निकल आई।

“बस अब यूँ ही बैठे रह, हिलना मत !”

वो टीवी देखती जा रही थी और मेरा लण्ड मलती जा रही थी। मुझे लण्ड मलने से बहुत मजा आ रहा था। मैंने भी जोश जोश में चाची की चूचियाँ दबा दी। पर अगले ही पल उन्होंने मेरा हाथ हटा दिया।

“आराम से बैठ कर देख मैं क्या करती हूँ !”

यह कह कर भाभी ने मेरे तने हुये लण्ड को जोर से मुठ मारना चालू कर दिया।

मैं कराह उठा। मैं चाची से लिपटता गया। वो मुझे धक्के दे कर हटाती रही, पर लण्ड नहीं छोड़ा उन्होंने। वो लण्ड को कठोर और कठोरतम तरीके से घिसने लगी।

मैं तड़प उठा, बल खाने लगा। पर उसकी तेजी और बढ़ गई। मैं सोफ़े पर लोट लगाने लगा पर चाची को जरा भी रहम नहीं आया। वो मेरा लण्ड छोड़ने को तैयार ही नहीं थी। मैंने सोफ़े पर ही अपनी दोनों टांगें ऊपर कर ली और बेबस सा मस्ती के आलम में डूब चला। तभी मेरे मुख से एक आह निकल पड़ी और मेरा लण्ड फ़ुफ़कारते हुये बरसने लगा।

बहुत सा वीर्य मेरे पेट पर और इधर उधर बिखरने लगा। चाची उसे देख कर खुशी से निहाल हो गई। मेरे वीर्य को उन्होने मेरे पेट पर मल दिया। अपनी एक अंगुली से मेरा गाढ़ा वीर्य लेकर चूसने लगी। मैं निढाल सा सोफ़े पर ही लेट गया। चाची भी मेरे ऊपर आकर लेट गई और मुझे चूमने लगी।

“चाची, बस एक बार चुदा लो !”

“मनीष, ऐसी बात ना कर !

उंह, भला यह कैसी चाची है, मर्दों का तो कबाड़ा कर देती है पर खुद को हाथ ही नहीं लगाने देती है। मुझे क्या भला क्या आपत्ति हो सकती थी। फ़्री में मजा करवा देती है यही बहुत है।

सवेरे ही सवेरे मेरी नींद अचानक उचट गई। मुझे कुछ अजीब सा लगा जैसे कोई मेरे लण्ड को सहला रहा है। मेरी आदत पेट के बल सोने की थी। मैं अपनी छोटी सी वीआईपी फ़्रेंची चड्डी में सोया करता था। मेरा लण्ड मेरी दोनों टांगो के मध्य में से दबा हुआ अकड़ा हुआ नीचे निकला हुआ था। मैं आनन्द के कारण वैसे ही उल्टा लेटा रहा।

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