यौन सुख का परम आनंद


मैं अमरावती से छः माह के लिए डेपुटेशन पर दिल्ली आया हुआ था। दिल्ली में एक बार के पास निर्मल से मुलाकात हो गई… अकस्मात् ही !
वो नशे में धुत्त था। हम वर्षों बाद मिले थे। उसने इतनी अधिक पी रखी थी कि चल नहीं पा रहा था। मैंने उसे सहारा दिया और उसे उसके घर तक छोड़ देने की पेशकश की। बड़ी मुश्किल से मैंने उसे उसके घर तक छोड़ा। दरवाजा रश्मि ने खोला था… उसकी पत्नी !

रश्मि लगभग 28 साल की अत्यंत खूबसूरत महिला है। निर्मल की हालत देखकर उसके चेहरे पर उदासी छा गई। उसने प्रश्नवाचक निगाहों से मेरी ओर देखा। मैंने अपना परिचय दिया- मैं निर्मल के बचपन का मित्र हूँ। आज अचानक उससे मुलाकात हो गई। उसे इस हालत में देखकर घर तक छोड़ने आया हूँ। वो आश्वस्त हुई… मुझे अभिवादन किया और फिर से आने का औपचारिक आमंत्रण देकर अंदर चली गई।

मैं वापस अपने गेस्ट हाउस जहाँ मेरे रहने की व्यवस्था थी, लौट आया।खाना खाकर सोया तो निर्मल और रश्मि के जीवन के बारे में सोचने लगा और ना जाने कब मुझे नींद लग गई। दो तीन दिन तक अपने कार्य में व्यस्त रहने के कारण मैं रश्मि और निर्मल को भूल चुका था। उस दिन रविवार था, अवकाश का दिन, सुबह के दस बजे थे, मैं निर्मल के घर जाने के लिए निकला। दरवाजा निर्मल ने ही खोला और आत्मीयता से मेरा स्वगत किया।

यह एक निम्न मध्यम वर्गीय परिवार था, घर साफ सुथरा और सजा संवरा हुआ था। मैं और निर्मल अपने बचपन के दिनों में खो गये, पुरानी बातें, संगी साथियों की बातें। हम काफी देर तक बतियाते रहे। इस बीच रश्मि चाय और नाश्ता ले आई।निर्मल ने रश्मि से मेरा परिचय कराया। मैंने ध्यान से रश्मि को देखा। मुझे वह अत्यंत खूबसूरत लगी। कद ज्यादा नहीं पर शरीर गठा हुआ था, चेहरा हंसमुख था।

उस दिन उन्होंने मुझे दोपहर का भोजन बिना किये आने नहीं दिया। निर्मल ने मुझे दिल्ली में रहने तक प्रतिदिन उसके यहाँ खाना खाने के लिए कहा तो मैंने असुविधा के कारण मना कर दिया। उन्होंने मुझे रात का खाना उनके यहां खाने के लिए राजी कर लिया।

अब मैं प्रतिदिन आफिस के बाद उनके यहाँ चले आता था और खाना खाकर रात साढ़े नौ-दस बजे लौटता था। अब तक रश्मि से मेरी घनिष्ठता हो गई थी जिसका एक कारण यह भी था कि वो नागपुर की रहने वाली थी। हम देर देर तक बैठकर बातें किया करते। निर्मल को पीने की बुरी लत थी, वो अक्सर पीकर देर से लौटता।

रश्मि ने मुझे बताया था कि शादी के सात साल बाद भी उन्हें कोई संतान नहीं है, इसी कुंठा में निर्मल दो तीन साल से अधिक शराब पीने लगा था, इस कारण घर पर अशांति भी होती थी। कभी-कभी मेरे ही सामने निर्मल शराब पीकर रश्मि से अभद्र व्यवहार करता तो मुझे बीच बचाव करना पड़ता। मैं शालीन था या मुझमें कोई ऐसी बात थी कि निर्मल मेरी बातों को बुरा नहीं मानता था, वो मुझ पर विश्वास करता था। रश्मि भी निर्मल को लेकर या अन्य कोई समस्या होती तो मुझे ही बताती थी।

मैं निर्मल को शराब पीना कम करने के लिये को काफी समझाता परंतु मेरे सामने तो वो आईंदा ना पीने की बात कहता पर शाम होते ही उसके पांव अनायास किसी बार की ओर चले जाते और वो नशे में धुत्त होकर घर लौटता।

इस तरह से मैं रश्मि के काफी करीब आता जा रहा था, हमारे संबंध भावनात्मक थे, दोनों एक दूसरे के प्रति आकर्षित थे। एक दिन मैंने रश्मि से कहा कि मेरे एक परिचित वैद्य हैं जिनकी दी हुई दवा से अनेक निःसंतान दंपत्तियों को लाभ हुआ है। यदि वो लोग चाहें तो मैं उन्हें वह दवा मंगाकर दे सकता हूँ। रश्मि ने निर्मल से इस बारे में बात की तो निर्मल भी राजी हो गया।

एक सप्ताह बाद मैंने वह दवा मंगाकर उन्हें दे दी। वह आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों से निर्मित चूर्ण जैसी दवा थी जिसे प्रतिदिन सुबह एक चम्मच खाली पेट खाना था। निर्मल ने दवा का नियमित सेवन प्रारंभ कर दिया। दिन बीतते गये, मुझे दिल्ली में चार माह हो गये थे, हमारे संबंधों में प्रगाढ़ता आ गई थी, निर्मल ने भी पीना कुछ कम कर दिया था। आप ये कहानी अन्तर्वासना- स्टोरी डॉट कॉम पर पढ़ रहे है l

मुझे दफ्तर के काम से दो तीन दिनों के लिए नागपुर जाना था, मैंने रश्मि से भी साथ चलने को पूछा तो वो राजी तो हो गई पर इसके लिए निर्मल की अनुमति जरूरी थी। मैंने निर्मल से कहा कि रश्मि को भी मेरे साथ नागपुर भेज दे, वो अपने मम्मी-पापा से मिल आयेगी।
निर्मल रश्मि से बहुत प्यार करता था। उसने थोड़ी ना-नुकुर के बाद इस शर्त पर हामी भर दी कि रश्मि दो तीन दिन के बाद मेरे साथ ही वापस आ जायेगी। रश्मि खुश हो गई। एक तो मेरा साथ और दूसरे काफी अर्से बाद वो अपने मम्मी-पापा से मिलने जा रही थी।

मैंने नागपुर जाने और आने का ए.सी. फर्स्ट क्लास के एक ही कूपे के चारों टिकट बुक करा लिए। निर्मल हमें स्टेशन तक छोड़ने आया था। उसे यह मालूम नहीं था कि फर्स्ट क्लास के उस कूपे का चारों टिकट मेरे ही पास है। नियत समय पर हल्के से हिचकोले लेते हुए ट्रेन ने स्टेशन छोड़ा, निर्मल और रश्मि ने हाथ हिला-हिलाकर एक दूसरे से विदा ली। ट्रेन के स्टेशन छोड़ते ही मैंने कूपे का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया।

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